⚔️ पृथ्वीराज चौहान – भाग 3 : “तराइन का पहला युद्ध”
दिल्ली की हवा उस रात भारी थी।किले की ऊँचाई से पृथ्वीराज चौहान चाँद को देख रहे थे,पर उनकी नज़रें कहीं
दिल्ली की हवा उस रात भारी थी।किले की ऊँचाई से पृथ्वीराज चौहान चाँद को देख रहे थे,पर उनकी नज़रें कहीं
दिल्ली की सुबह वैसी नहीं थी जैसी अजमेर की।यहाँ की हवा में सोने की चमक थी, लेकिन भरोसे की नहीं।राजधानी