⚔️ पृथ्वीराज चौहान – भाग 3 : “तराइन का पहला युद्ध”

दिल्ली की हवा उस रात भारी थी।
किले की ऊँचाई से पृथ्वीराज चौहान चाँद को देख रहे थे,
पर उनकी नज़रें कहीं और थीं — उत्तर दिशा में,
जहाँ से रेत की आँधी में छिपकर एक परछाई बढ़ रही थी।

मोहम्मद गोरी — वह नाम अब अफवाह नहीं रहा था,
वह अब सच्चाई बन चुका था।
उसने सिंध और पंजाब के कई हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया था,
और उसकी निगाह अब दिल्ली की दीवारों पर थी।

दरबार में चिंता छाई हुई थी।
मंत्री बोले —

महाराज, गोरी चतुर है। उसकी सेना में हज़ारों अश्वारोही हैं, और उसके पास लोहा है — तेज़ और घातक।”

पृथ्वीराज शांत थे।
उनकी आँखों में भय नहीं, बस दृढ़ता थी।
उन्होंने कहा —

लोहा चाहे कैसा भी हो,
जब तलवार न्याय के लिए उठती है, तो देवता भी उसके साथ खड़े होते हैं।”

फिर उन्होंने अपने सेनापति चाँदबरदाई को बुलाया।
चाँदबरदाई — कवि, मित्र, और युद्धनीति में पारंगत।
वह बोले —

“राजन, गोरी की चाल युद्ध नहीं, राजनीति है।
वह पहले विभाजन करता है, फिर आक्रमण।”

पृथ्वीराज ने उत्तर दिया —

“तो फिर हम एक होंगे।
अजमेर, दिल्ली, कन्नौज — सब एक ध्वज के नीचे।”

पर यह आसान नहीं था।
जयचंद, अब भी अपमान के ज़हर से भरा हुआ,
उत्तर के राजाओं को भड़काने में लगा था —
“चौहान ने परंपरा तोड़ी, अब उसका अंत निश्चित है।”


लेकिन पृथ्वीराज को इससे फर्क नहीं पड़ा।
उन्होंने राजधानी में सेना की तैयारी शुरू की।
धनुर्धर, अश्वारोही, पैदल सैनिक — सब जुटने लगे।
शहर के मंदिरों में शंख बजे,
लोगों ने अपने राजा के नाम से मिट्टी उठाकर माथे पर लगाई।

एक वृद्ध सैनिक ने कहा —

जब तक ये धरती है, चौहान झुकेगा नहीं।”


फरवरी की सुबह थी।
दिल्ली की सीमाओं से आगे बढ़ती हुई चौहान सेना
अब हरियाणा के तराइन मैदानों तक पहुँच चुकी थी।
यह वही स्थान था जहाँ धूल और भाग्य, दोनों उड़ने वाले थे।

गोरी की सेना उत्तर दिशा से उतर रही थी —
उसके साथ विदेशी योद्धा, लोहे के घोड़े, और अजीब युद्ध तकनीकें थीं।
लेकिन भारत की भूमि पर खड़े चौहान सैनिकों के दिल में विश्वास था।

युद्ध की पूर्व संध्या पर पृथ्वीराज ने अपनी सेना के सामने खड़े होकर कहा —

आज अगर तुम तलवार उठाओगे,
तो यह केवल भूमि के लिए नहीं,
यह अपनी मिट्टी के स्वाभिमान के लिए होगी।
याद रखना, जब तक एक चौहान सांस ले रहा है,
दिल्ली किसी और की नहीं होगी।”

सेना गर्जना करने लगी — “जय चौहान! जय चौहान!”


⚔️ पहला युद्ध – तराइन की धरती पर

अगली सुबह सूरज उगा तो हवा में धूल थी,
और रणभूमि पर दोनों सेनाएँ आमने-सामने।
गोरी ने पहली चाल चली —
उसने अपने तीरंदाज़ आगे भेजे,
जिन्होंने दूर से ही तीरों की वर्षा शुरू कर दी।

पृथ्वीराज ने मुस्कराते हुए कहा —

जो दूर से वार करते हैं,
वो नज़दीक आने से डरते हैं।

उन्होंने अपने धनुर्धरों को संकेत दिया।
धनुष ताने गए — और आसमान में तीरों का जाल बुन गया।
हवा जैसे काँप उठी।
घोड़ों की टापों के बीच मिट्टी की लहरें उठीं।

पृथ्वीराज खुद अग्रिम पंक्ति में उतरे।
उनके साथ आंध्र के योद्धा, गज सेनाएँ और राजपूत वीर थे।
एक तीर उनके कंधे को छूता हुआ निकला,
पर वह रुके नहीं —
उन्होंने तलवार उठाई और बोले —

“जिसका नाम चौहान है,
वो तब तक लड़ता है जब तक सांस चलती है!”

उनके वार से कई दुश्मन घोड़े समेत गिरे।
चाँदबरदाई ने कहा —

राजन, ये युद्ध तुम्हारा नहीं, युग का है।”

गोरी ने देखा कि चौहान सेना हार नहीं रही।
वह पीछे हटने लगा — उसकी सेना में भ्रम फैल गया।
कुछ ही घंटों में मैदान भारतीयों के नाम था।
गोरी पकड़ा गया — घायल, पर ज़िंदा।

पृथ्वीराज के सामने उसे लाया गया।
गोरी ने कहा —

“राजन, मुझे जाने दो। मैं फिर कभी नहीं लौटूँगा।”

पृथ्वीराज ने उसकी आँखों में देखा और बोला —

राजपूत कभी शरण मांगने वाले पर वार नहीं करता।”

गोरी को छोड़ दिया गया —
और यही, इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य बना।


दिल्ली में उत्सव था।
लोगों ने कहा — “भारत ने अंधकार को हरा दिया!”
पर किसी ने यह नहीं सोचा कि छोड़ा गया शत्रु एक दिन लौटेगा —
और इस बार बदले की आग के साथ।

चाँदबरदाई ने चुपचाप कहा —

राजन, आपने उसे जीवन दिया,
पर शायद वही एक दिन हमारी साँसें लेगा।”

पृथ्वीराज ने उत्तर दिया —

“अगर नियति लौटेगी, तो मैं भी तलवार लेकर तैयार रहूँगा।”


रात का समय था।
किले के ऊपर खड़े पृथ्वीराज ने दूर क्षितिज देखा,
जहाँ से चाँद निकल रहा था — वही दिशा, जहाँ से कभी गोरी आया था।
वह बोले —

वो वापस आएगा…
और तब ये धरती फिर लहूलुहान होगी।
पर इतिहास गवाह रहेगा —
कि चौहान झुकेगा नहीं।


(भाग 3 समाप्त)

अगले भाग में…
“तराइन का दूसरा युद्ध”
जहाँ लौटेगा गोरी — बदले की आग लेकर।
और जहाँ नियति पृथ्वीराज के शौर्य की सबसे बड़ी परीक्षा लेगी।

कभी-कभी वीरता हार जाती है,
पर उसका नाम अमर हो जाता है।”

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