⚔️ पृथ्वीराज चौहान – भाग 2 : “दिल्ली की गद्दी और कन्नौज का अपमान”

दिल्ली की सुबह वैसी नहीं थी जैसी अजमेर की।
यहाँ की हवा में सोने की चमक थी, लेकिन भरोसे की नहीं।
राजधानी के विशाल लाल पत्थरों के बीच से निकलती ठंडी हवा जैसे हर दीवार से पूछती थी — “कब तक?”

वक्त बदल चुका था।
राजा सोमेश्वर अब इतिहास बन चुके थे, और अजमेर का युवा शेर अब दिल्ली का सम्राट था।
सिंहासन विशाल था, पर उस पर बैठना आसान नहीं।
दरबार में चापलूसों की भीड़ थी, और हर चेहरे के पीछे एक मुखौटा।

युवा पृथ्वीराज ने दिल्ली की गद्दी संभाली —
पर उसके दिल में आज भी अजमेर की मिट्टी की गंध थी।
वह चाहता था कि राज्य की सीमाएँ जितनी बड़ी हों, न्याय उतना ही गहरा हो।
लेकिन जो दुनिया उसने विरासत में पाई थी, उसमें तलवारें मुस्कान से ज्यादा बोली जाती थीं।

दरबार के एक कोने में चुपचाप खड़ा वृद्ध मंत्री, सोमदेव, बोला —
“महाराज, दिल्ली आपको सम्मान दे रही है, पर भरोसा नहीं।
यहाँ हर मित्र कल शत्रु बन सकता है।”
पृथ्वीराज ने उत्तर दिया —
“तो ऐसा हो कि शत्रु भी मेरे न्याय से डरें।”

राज्य की व्यवस्था सँभालते-सँभालते कई महीने बीते।
दिल्ली में अब उसका शासन फैलने लगा।
सड़कें सुधारी जा रहीं थीं, सैनिकों का पुनर्गठन हो रहा था।
पर जैसे-जैसे उसके नाम की चर्चा बढ़ी, वैसे-वैसे ईर्ष्या भी जन्म लेने लगी।

कन्नौज के राजा जयचंद ने समाचार पाया कि दिल्ली और अजमेर दोनों अब पृथ्वीराज के अधीन हैं।
जयचंद वह नाम था जो गर्व और ईर्ष्या दोनों से भरा था।
वह सोचने लगा — “अगर चौहान वंश और तोमर वंश एक हो गए,
तो कन्नौज की महत्ता मिट जाएगी।”

इसी बीच एक और कहानी पनप रही थी — संयोगिता की।
जयचंद की पुत्री, जो राजमहल की ऊँची दीवारों के बीच पली थी,
उसका दिल अब दूर अजमेर के शेर के लिए धड़कता था।
वह अपनी सखियों से कहती,

अगर इतिहास में कभी प्रेम और वीरता साथ लिखे जाएँगे,
तो उस पृष्ठ पर मेरा और पृथ्वीराज का नाम होगा।

वह अपने कमरे की दीवारों पर चौहान के चित्र बनवाती,
उनके कारनामे सुनकर मुस्कराती, और अपने पिता की कठोर निगाहों से छिपकर सपने देखती।

लेकिन जयचंद को सब पता था।
उसने अपने दरबार में कहा —

“एक अपमानजनक बात फैल रही है,
कि मेरी पुत्री का मन किसी दूसरे राजा में है।

दरबारी चुप रहे।
जयचंद ने तलवार उठाई — “वो चौहान अगर मेरे द्वार तक पहुँचा,
तो मैं इतिहास को लहू से रंग दूँगा।”


उधर दिल्ली में, पृथ्वीराज को भी समाचार मिला।
उसने कोई उत्तर नहीं दिया, बस अपनी तलवार की मूठ को छुआ और कहा —

कभी-कभी प्रेम भी युद्ध का रूप लेता है।”

फिर उसने निर्णय लिया — कन्नौज जाएगा, और सबके सामने अपने प्रेम को सच करेगा।


🌙 स्वयंवर का दिवस

कन्नौज के महल में दीपों की जगमग थी।
जयचंद ने अपनी पुत्री का स्वयंवर रखा था।
चारों दिशाओं के राजा, सामंत और योद्धा उपस्थित थे।
सिंहासन पर बैठा जयचंद गर्व से बोला —

“जिसे मेरी पुत्री वरमाला पहनाएगी, वही कन्नौज का भाग्य बनेगा।”

संयोगिता ने सभा में प्रवेश किया।
उसकी आँखें चारों ओर ढूँढ रही थीं —
पर पृथ्वीराज वहाँ नहीं था।
जयचंद मुस्कराया, “शायद वो जानता है, यहाँ उसका स्वागत नहीं।”

तभी बाहर से घोड़ों की टापें सुनाई दीं।
दरबार हिला।
द्वार खुला — और धूल के बादल में एक छवि उभरी —
पृथ्वीराज चौहान, अपने स्वर्ण कवच में, सूर्य की तरह चमकते हुए।

जयचंद का चेहरा सख्त पड़ गया।
सभा में कानाफूसी शुरू हुई।
संयोगिता के होंठों पर मुस्कान थी।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी, सबके बीच से, और वरमाला पृथ्वीराज के गले में डाल दी।
उस क्षण ऐसा लगा जैसे सभागार की दीवारें भी इतिहास की गवाही दे रही हों।

जयचंद क्रोध से कांप उठा।
उसने तलवार खींची —

ये मेरे दरबार का अपमान है!”

पृथ्वीराज ने उत्तर दिया —

नहीं महाराज, यह प्रेम का सम्मान है।”

इतना कहकर उसने संयोगिता का हाथ थामा,
और दोनों घोड़े पर सवार होकर कन्नौज के महल से निकल पड़े।
पीछे तीर चले, सैनिक दौड़े,
पर हवा ने दिशा बदल दी — चौहान फिर भी निकल गए।


रात लंबी थी।
अजमेर लौटते हुए पृथ्वीराज ने कहा —

प्रेम की राह कठिन होती है,
पर इससे सुंदर युद्ध कोई नहीं।

संयोगिता मुस्कराई — “और अगर यह युद्ध पिता से हो?”
पृथ्वीराज ने उत्तर दिया — “तो मैं जीत नहीं, सम्मान चाहता हूँ।”


लेकिन जयचंद का अपमान अब युद्ध में बदल चुका था।
उसने उत्तर के तुर्क शासक मोहम्मद गोरी से हाथ मिला लिया।
वह बोला — “अगर चौहान मेरी बेटी छीन सकता है,
तो मैं उसका राज्य छीन लूँगा।”

गोरी ने धीमी हँसी हँसी —

तो फिर तैयार रहो, भारत का सूरज डूबने वाला है।”


दिल्ली में बैठे पृथ्वीराज को जैसे हवा ने चेतावनी दी।
रात के अंधेरे में मशालों की लौ काँप रही थी।
वह किले की दीवार पर खड़ा आसमान देख रहा था।
दूर बादलों के बीच बिजली चमकी —
और उसने धीरे से कहा —

“अंधकार आने वाला है,
लेकिन जब तक मेरे हाथ में यह तलवार है,
मैं किसी सूरज को डूबने नहीं दूँगा।”


(भाग 2 समाप्त)

अगले भाग में…
आने वाला है तराइन का पहला युद्ध
जहाँ पृथ्वीराज और मोहम्मद गोरी पहली बार आमने-सामने होंगे।
और इतिहास तय करेगा कि प्रेम जितना सुंदर होता है,
युद्ध उतना ही निर्दयी।

वो रात, जब दिल्ली ने पहली बार अपनी साँसें रोक लीं —
और धरती ने कहा, ‘अब फैसला होगा।’

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