⚔️ पृथ्वीराज चौहान – भाग 1 : “अजमेर का शेर”

prithviraj chauhan

रेगिस्तान की सुबह शांत थी। हवा में मिट्टी की गंध थी, और अरावली की पहाड़ियों के पीछे से सूरज धीरे-धीरे सिर उठा रहा था। अजमेर का तारागढ़ किला उस सुनहरी रोशनी में नहाया हुआ लग रहा था, जैसे कोई पुराना योद्धा अपने घावों को सूरज की किरणों से भर रहा हो। किले के भीतर, राजमहल की दीवारों में शंख बजने की आवाज़ गूँज उठी थी — एक बालक जन्मा था। वह बालक था पृथ्वीराज, चौहान वंश का भविष्य।

उस क्षण जब उसने पहली बार रोया, तो राजमहल की दीवारें काँप उठीं। महल के आँगन में बैठे बुज़ुर्ग ज्योतिषियों ने एक-दूसरे को देखा, फिर बोले —
“यह बालक साधारण नहीं, राजमाता। इसकी आँखों में तेज़ है, और जन्मपत्री में रण का संकेत।”

रानी कर्पूरदेवी ने शिशु को अपनी बाहों में लिया और धीमे स्वर में कहा —
“अगर इसका भाग्य रण में लिखा है, तो मैं इसे डर से नहीं, गर्व से पालूँगी।”

वक्त बीता। अजमेर की गलियों में वह बालक अब घोड़े की टापों के साथ बड़ा होने लगा। जब दूसरे बच्चे खिलौनों से खेलते, वह धनुष की डोरी खींचने की कोशिश करता। उसके गुरु, भद्राचार्य, अकसर मुस्कराकर कहते —
“राजकुमार, तुम्हारे हाथ छोटे हैं, पर इरादा बड़ा। जब यह डोरी तुम्हारे वश में आ जाएगी, तो एक दिन यह डोरी भारत का इतिहास खींचेगी।”

पृथ्वीराज हर बात को गंभीरता से लेता। उसकी आँखों में एक अद्भुत शांति थी — ऐसी शांति जो भीतर छिपे तूफ़ान को ढक लेती है। एक बार उसने अपने गुरु से पूछा,
“गुरुजी, योद्धा कब पैदा होता है?”
भद्राचार्य बोले, “जब कोई अपने भय से नहीं, अपने कर्तव्य से लड़ता है।”

उस दिन से उसने डर को अपना साथी बना लिया।

वक़्त का पहिया घूमता गया। अजमेर का राजकुमार अब चौदह वर्ष का हो गया था। एक सुबह, जब वो धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था, किले के प्रहरी दौड़ते हुए आए। “महाराज! सीमा पर हमला हुआ है, मेवाड़ के डाकुओं ने गाँव जला दिए!”

दरबार में हलचल मच गई। राजा सोमेश्वर ने सैनिकों को आदेश दिया — “सेना तैयार करो।”
तभी दरबार के कोने से एक दृढ़ स्वर उठा — “पिता, मुझे जाने दीजिए।”

सभी की नज़रें उस ओर घूमीं। दरबार के बीच खड़ा पृथ्वीराज, अभी किशोर, पर उसकी आँखों में परिपक्वता की अग्नि थी।
राजा ने कहा, “बेटा, ये युद्ध है, खेल नहीं।”
पृथ्वीराज मुस्कराया, “राजा का बेटा कब तक राजकुमार रहेगा, पिता? एक दिन उसे अपने नाम का अर्थ साबित करना ही होगा।”

मौन छा गया। कुछ पल बाद राजा सोमेश्वर ने कहा, “जाओ, पर याद रखो — जीत हमेशा तलवार से नहीं, सत्य से होती है।”

अगली सुबह रेत के मैदान में एक छोटा-सा दल रवाना हुआ। सूरज सिर पर था, और हवा में गर्मी का कंपन। पृथ्वीराज के साथ कुछ सिपाही थे, पर उसके चेहरे पर भय का कोई निशान नहीं। उसकी तलवार सूरज की किरणों को पकड़ रही थी। उसने हवा की दिशा देखी, और कहा, “रेत हमारी ढाल है। जब यह उठेगी, दुश्मन को दिखाई भी नहीं देगा कि वार कहाँ से आया।”

शाम ढलते-ढलते, युद्धभूमि में डाकू और राजकुमार आमने-सामने थे। डाकू हँसे — “अजमेर के बच्चे, यहाँ से वापस नहीं जाओगे।”
पृथ्वीराज ने बस इतना कहा — “देखना, आज तुम इतिहास में मरोगे और मैं इतिहास बनूँगा।”

तलवारें खिंच गईं। रेत का तूफ़ान उठा। घोड़ों की टापें गूँजीं।
डाकुओं का नेता आगे बढ़ा, पर उससे पहले ही एक तीर सीधा उसकी छाती में लगा। वह ज़मीन पर गिर पड़ा। किसी ने नहीं देखा कि तीर चला कैसे — बस इतना कि हवा में एक ध्वनि हुई थी, और फिर सन्नाटा।

जब युद्ध खत्म हुआ, रेत पर केवल एक आवाज़ थी — “जय पृथ्वीराज!”

राजमहल में उत्सव मनाया गया। राजा सोमेश्वर ने पुत्र को गले लगाया और कहा,
“वीर वही नहीं जो जीतता है, वीर वह है जो लोगों के लिए लड़ता है।”
उस दिन दरबार ने उसे नया नाम दिया — “अजमेर का शेर।”

दिन बीते, पर एक और कहानी जन्म ले रही थी। कन्नौज में, जयचंद की पुत्री संयोगिता अपने महल की छत पर चाँद देख रही थी। उसने सुना था कि अजमेर का एक राजकुमार है, जो कभी युद्ध से नहीं डरता।
वह धीमे से बोली, “अगर कभी वह मेरे स्वप्नों में आए, तो मैं उसे पहचान लूँगी।”

भाग्य मुस्कराया। क्योंकि इतिहास पहले ही तय कर चुका था —
प्रेम और युद्ध, दोनों उसी के लिए लिखे गए हैं।

लेकिन उसी समय, अजमेर में राजा सोमेश्वर की तबीयत गिरने लगी। राजकाज की ज़िम्मेदारी अब धीरे-धीरे पृथ्वीराज के कंधों पर आने लगी। कुछ दरबारी फुसफुसाने लगे — “किशोर राजा कैसे राज्य चलाएगा?”
पर पृथ्वीराज ने एक सभा में कहा —
“राज्य तलवार से नहीं, न्याय से टिकता है। और न्याय उम्र से नहीं, हृदय से आता है।”

लोगों ने देखा — यह लड़का अब केवल पुत्र नहीं, राजा बनने लगा है।

समय का पहिया फिर घूमा। राजा सोमेश्वर का निधन हुआ। अजमेर शोक में डूब गया। अंतिम संस्कार की अग्नि के बीच युवा पृथ्वीराज खड़ा था, आँसू नहीं, केवल संकल्प।
उसने कहा, “पिता, आज आपका शरीर अग्नि को समर्पित हुआ है, पर आपकी प्रतिज्ञा अब मेरी तलवार बनेगी।”

कुछ महीनों बाद, जब दिल्ली के वृद्ध राजा अनंगपाल तोमर ने सुना कि अजमेर का बालक अब सिंहासन संभाल चुका है, तो उन्होंने अपने नाती पृथ्वीराज को बुलाया। दिल्ली का राजसिंहासन अब उसे सौंपा गया —
और इतिहास ने नया अध्याय खोला।

दिल्ली का राजा बनना आसान नहीं था। यहाँ सत्ता का खेल चलता था। सलाहकारों की मुस्कानें और साज़िशों के तीर साथ-साथ चलते थे।
पर पृथ्वीराज में एक अलग ही तेज़ था। वह दरबार में सबकी बातें सुनता, पर निर्णय अकेला लेता।

एक दिन एक व्यापारी दरबार में आया। उसने कहा, “महाराज, उत्तर दिशा से अजीब लोग हमारे बाज़ारों में देखे गए हैं। विदेशी हैं, पर उनकी आँखों में लालच है।”
दरबार में सन्नाटा छा गया। किसी ने फुसफुसाया, “शायद वही तुर्क हैं, जिनकी चर्चा सिंध से चलकर पंजाब तक पहुँची है।”

पृथ्वीराज ने शांत स्वर में कहा,
“चाहे वे कितनी ही दूर से क्यों न आएँ, अगर उन्होंने हमारी भूमि को छूने की कोशिश की, तो यह मिट्टी खुद उनसे जवाब लेगी।”

फिर वह बाहर आकाश की ओर देखने लगा। दूर उत्तर की दिशा में बादलों की एक परत जमा हो रही थी। हवा में एक अनकहा संकेत था।
उसने धीरे से कहा,
“हर प्रकाश के पीछे अंधकार होता है।
शायद वह अब पास आ रहा है।”

रात गहरी हुई। किले की दीवारों पर मशालें जल रही थीं।
पृथ्वीराज अपनी तलवार के पास बैठा था। उसकी उँगलियाँ तलवार की मूठ को छू रही थीं, जैसे वह किसी पुराने वादे को याद कर रहा हो।

और फिर उसने बुदबुदाया —
“अभी ये कहानी शुरू हुई है…
जिस दिन मैं दिल्ली की धरती पर अंतिम बार तलवार उठाऊँगा,
उस दिन इतिहास मेरी आँखों से बहेगा।”

हवा चली। दीपक की लौ हिली।
दूर कहीं से एक घोड़े की टापों की आवाज़ आई —
शायद भविष्य आ रहा था, अपनी पहली चाल के साथ।


(भाग 1 समाप्त)

अगले भाग में…
उत्तर से आएगा एक अजनबी — मोहम्मद गोरी
और शुरू होगा वह खेल जहाँ प्रेम, विश्वास और विश्वासघात तीनों एक ही रणभूमि में उतरेंगे।

जब दिल और धरती दोनों दांव पर हों —
तो इतिहास तय करता है, कौन वीर है और कौन विजेता।”

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