
रहस्यमय जन्म और पहली भविष्यवाणी
चंद्रमा की रोशनी में अजमेर के महल में एक अज्ञात साधु आया। उसके हाथ में एक काला लोटा और माथे पर तिलक था। रानी कर्पूरेदेवी नवजात राजकुमार को बाहों में झुला रही थीं।
साधु ने कान में फूँक मारी, “यह बालक इतिहास बनाएगा, किंतु उसकी आत्मा आज़माइश के उस ऊँचे पहाड़ को चढ़ेगी, जहाँ से गहरी खाई है… उसे हर कदम पर दम घोटने वाली साज़िशें मिलेंगी।”
रानी घबरा गईं, राजा सोमेश्वर देव ने हँसकर बात टाल दी। लेकिन वह रात अजमेर के सुरक्षाकर्मियों को भी चैन से सोने न दी।
दोस्ती, ईर्ष्या, और पहला धमाका
पृथ्वीराज बड़ा होने लगा। चंद बरदाई उसका सिर्फ़ मित्र नहीं, रहस्य-साझेदार भी था। दोनों जंगल में शिकार करते, किलों पर चढ़ाई की योजनाएँ बनाते और साथ में हर रात राजमहल की छत पर सितारे गिनते।
पर अजमेर के राजमहल में एक और राजकुमार था — जयचंद, कन्नौज नरेश का क्रूर पुत्र, जो खुले में तो मित्रता की बातें करता, परतन में ईर्ष्या पाले बैठा था।
एक दिन किले के अंदर अचानक एक धमाका हुआ — शाही अस्तबल में भीषण आग लग गई। पृथ्वीराज और चंद बरदाई ने जान पर खेल घोड़े बचाए, लेकिन महल के मुखिया उनके साहस से कम, आग के कारण से ज़्यादा चिंतित दिखे।
रात को एक पत्र महल के दरवाजे के नीचे मिला— ‘राज्य के सबसे पासवाले कभी सबसे दूर निकल सकते हैं।’
रहस्यमय लड़की और गुप्त संदेश

एक दिन जंगल में शिकार कर लौटते समय पृथ्वीराज की मुलाक़ात एक रहस्यमय लड़की से हुई—संयोगिता! उसकी आँखें ज्यों दो गहरी झीलें, जिनमें चांदनी हिलोरें मारती थी। पहली नज़र में ही दोनों के दिल में हलचल मच गई, पर संयोगिता ने एक पहेली सुनाई:
“अगर तुम्हारे राज्य पर अंधेरा छाए, किसे सबसे पहले परखोगे — अपने तलवार, अपने साए, या अपने विश्वास?”
पृथ्वीराज मुस्कुराया पर संयोगिता का चेहरा एक पल में गंभीर हो गया। “विश्वास। बाकी सब कभी भी बदल सकते हैं।”
अंधेरे में कोई दोनों को देख रहा था — जयचंद का नायक, जो हर बात गुप्त संदेश में बदलकर कन्नौज भेजता रहा।
युद्ध, विश्वासघात और पहला खून
पश्चिम से घोरियों की टुकड़ी बढ़ी और पहली बार दिल्ली के पास छोटी जंग छिड़ी। पृथ्वीराज ने दहाड़ लगाई; वीरता से दुश्मन को खदेड़ा, लेकिन युद्ध के मैदान में एक तीर उनकी ऊँगली छू गया। लड़ाई के बाद सैनिकों को एक अनजान रूमाल मिला — जयचंद के महल की मुहर के साथ।
पृथ्वीराज ने चुपचाप चंद बरदाई को बुलाया — “मित्र, राज्य से बड़ा सत्य सिर्फ़ एक — विश्वास। मुझे बेइमानी की बू आ रही है।”
वो रात काली थी, किले के तहखाने से कोई लंबा काली छाया दीवार पर फिसलती दिखी — और खून जमा देने वाली हँसी ने भेद खोल दिया; महल के भीतर कोई जासूस है!
प्रेम, जुर्म और छल का जहर

प्रेम की पहली बारिश के साथ संयोगिता और पृथ्वीराज का रिश्ता गहरा हुआ। पर उनकी हर मुलाक़ात पर नामालूम साये थे — कन्नौज के भेदिए, जयचंद की बहन और पत्थर की मूर्ति में छिपी नन्हीं सी सोने की संदूक।
वो संदूक खोली तो एक चिट्ठी मिली—’राज्य की छाया वहाँ पहुँचती है, जहाँ सूर्य का तेज नहीं’।
एक रात अंतरंग समारोह में, जयचंद ने संयोगिता के कान में धीरे से कहा, “राजा की जगह उसकी कमज़ोरी पकड़ो, वो तारीख बदल देगा…”
महान युद्ध और सबसे भयानक गद्दारी
तराइन की वह सुबह—चारों तरफ़ विजयी घोष, हाथी व घोड़ों की हिनहिनाहट। पृथ्वीराज युद्ध की सबसे आगे, उनकी तलवार से हर वार बिजली बन बैठता था।
अचानक पीछे से सैनिकों की पंक्ति टूटी — जयचंद के सिपाही अचानक मुहम्मद गोरी की तरफ़ हो गए। गद्दारी की गूँज रणभूमि पर दूर तक फैल गई।
पृथ्वीराज को ताज की चिंता नहीं रही, वह खुद शत्रु के बीच घुस गए; चोट आई, ज़ख्म हुआ, पर वीरता बरकरार।
अंत में जब पृथ्वीराज गिरने लगे, चंद बरदाई ने झुककर कान में फुसफुसाया, “महाराज, यह सिर्फ़ युद्ध नहीं, इतिहास की सबसे बड़ी परीक्षा है — न हारना।”
बंदीगृह, रहस्य और सबसे बड़ा बदला
गोरी ने पृथ्वीराज को कैद कर ग़ज़नी भेजा। वहाँ उसके दरबार में रोज़ अपमान; पर हर रात पृथ्वीराज अपने मन में एक नई उम्मीद की कहानी सुनते।
चंद बरदाई ने खुफिया संदेश पहुँचाया —
“राजा का सच उसके तीर और बुद्धि में है, आँखों में नहीं।”
फिर वह ऐतिहासिक चुनौती आई — बिना देखे लक्ष्य भेदना।
चंद बरदाई ने कूटभाषा में पुनः बताया:
चार बांस चौंसठ हाथ, अष्टम दूरी थाम…
तेज तीर छोड़ा गया — और गोरी की क्रूरता वहीँ समाप्त।
अमरता, रहस्य और नई सुबह
उस पल दोनों ने वहीं वीरगति पाई, लेकिन उनके किस्से अजमेर से दिल्ली तक, किसान से योद्धा तक हमेशा के लिए गूँज गए। एक अगली सुबह, जब किला खाली था, वहाँ की दीवारों में खून की धार जैसी कोई बनावट दिखी — मानो कोई और बड़ा राज़ उस महल में छिपा हो।
आज भी, दूर गंगा के किनारे, किसी रात अनजाना धुंध में कोई तलवार-सी आवाज़ आती है। गाँव वाली whispers में कहते हैं — “पृथ्वीराज चौहान का दिल आज भी हर गद्दार की साँस में डर बनकर धड़कता है।”